*Om Shanti*
*Answers from Sakar Murli 25-07-2020*
1. हम रचयिता और रचना के आदि-मध्य-अन्त को जान गये हैं। तो आदि में *नई दुनिया में नया भारत* कैसा था? (3) अब अन्त में विश्व कैसा बन गया है?
° भारत में सतयुग (स्वर्ग, दिन, विष्णुपुरी, शिवालय, वन्डर ऑफ वर्ल्ड) था तो देवी-देवताओं *(लक्ष्मी-नारायण) का राज्य* था (वजीर भी नहीं), एक ही धर्म था। है ।
° भारत *मोस्ट सालवेन्ट* था। हीरे-जवाहरों के महल थे
° वाइसलेस, *महान् पवित्र देश* था
° अभी है 100 परसेन्ट इरिलीजस, अनराइटियस, इनसालवेन्ट, पतित विशश
2. अभी तुम समझाते हो कि भारत की _____ कला और _______ कला कैसे होती है।
°चढ़ती, उतरती
3. जबकि देही-अभिमानी को ही ईश्वरीय सम्प्रदाय कहा जाता है (क्योंकि ईश्वर को देह है ही नहीं। सदैव आत्म-अभिमानी है।), तो *आत्म-अभिमानी बनने के लिए* बाबा ने आज कौन-कौन सी पॉइंट्स सुनाई? (3)
° *रूहानी बच्चे* सुन रहे हैं। अपने को *आत्मा समझकर* बैठो। देह न समझो। हम *फर्स्टक्लास* आत्मा हैं।
° आत्मा *अविनाशी* है, शरीर विनाशी है। आत्मा *शरीर द्वारा पार्ट* बजाती है। आत्मा तो *अशरीरी* है ना। कहते भी हैं अशरीरी आये हैं, अशरीरी जाना है।
° *भृकुटी के बीच* चमकता है अजब सितारा। उसमें *84 जन्मों का पार्ट* भरा हुआ है।
4. व्यर्थ से बेपरवाह बनो, _______ में नहीं।
°मर्यादाओं
5. जबकि हमे परमपिता परमात्मा (सुप्रीम आत्मा, सभी आत्माओं का बाप। ऊंचे ते ऊंच।) को याद करना है, तो उनका *रूप* , *महिमा* और (हमसे) *सम्बन्ध* क्या है?
° (रूप) वह *निराकार* है (जन्म-मरण में नहीं आते)।
° (महिमा) *ज्ञान का सागर, शान्ति का सागर, पवित्रता का सागर*, यह उस एक की ही महिमा है। (दूसरे कोई की महिमा हो नहीं सकती। देवताओं की महिमा अलग है, परमपिता परमात्मा शिव की महिमा अलग है। वह है बाप।)
° (सम्बन्ध) वह हमारा क्रिएटर, रचता, बाप है ( *सर्व* ही सम्बन्ध है)
6. इस रूद्र *यज्ञ* का पूरा नाम क्या है?
° राजस्व अश्वमेध अविनाशी रूद्र गीता ज्ञान यज्ञ।
7. बाबा के *स्नेह का रिटर्न* क्या है? ऐसा बनने से *प्राप्ति* क्या है? तो अभी कौन-सा *पुरुषार्थ* करना है?
° *फरिश्ते पन की स्थिति में स्थित होना* – यही बाप के स्नेह का रिटर्न है।
° ऐसा रिटर्न देने वाले *समाधान स्वरूप* बन जाते हैं। समाधान स्वरूप बनने से स्वयं की वा अन्य आत्माओं की समस्यायें स्वत: समाप्त हो जाती हैं।
° तो अब ऐसी सेवा करने का समय है, लेने के साथ *देने का समय* है। इसलिए अब *बाप समान उपकारी* बन, पुकार सुनकर अपने फरिश्ते रूप द्वारा उन आत्माओं के पास पहुंच जाओ और समस्याओं से थकी हुई आत्माओं की *थकावट उतारो*।
8. इस सच्चे-सच्चे *सतसंग* (सत का संग) और दुनिया के सत्संगो में कौन-से 2 मुख्य अन्तर हैं?
° उसमें *आत्मा या परमात्मा का ज्ञान* न कोई में है, न दे सकते हैं।
° वहाँ तो कोई *एम आबजेक्ट* होती नहीं। तुम बच्चे तो अभी *पढ़ाई* पढ़ रहे हो।
9. इस युग को *पुरूषोत्तम* संगमयुग क्यों कहा जाता है?
° बाबा हमको ऐसा *पुरूषोत्तम बनाते* हैं। (यह सच्ची सत्य नारायण की कथा है। सत्य बाप तुमको नर से नारायण बनने का राजयोग सिखला रहे हैं। यह ज्ञान सिर्फ एक बाप के पास है।)
° बाप तुमको पुरूषोत्तम, *पारसबुद्धि* बना रहे हैं।
° बाप मनुष्य से *देवता* बनने की तुम्हें सुमत देते हैं।
10. बाप की मत के लिए ही गाया जाता है तुम्हरी गत- *मत न्यारी*…..। क्यों?
° बाप समझाते हैं मैं *ऐसी श्रेष्ठ मत देता हूँ जो तुम देवता बन जाते* हो।
11. भारत ही *ऊंच खण्ड* है, जो भी मनुष्य मात्र हैं, उनका यह *तीर्थ* है। कैसे?
° सर्व की सद्गति करने *बाप यहाँ ही आते* हैं। रावण राज्य से लिबरेट कर गाइड बन ले जाते हैं।
12. इस नॉलेज को पूरी रीति समझने में *7 रोज़* क्यों लगते हैं? (2)
° पतित *बुद्धि को पावन* बनाना है।
° सिर्फ स्थूल प्राप्तियों से समझते हैं हम स्वर्ग में बैठे हैं। सुखधाम (स्वर्ग) को बिल्कुल जानते नहीं क्योंकि पत्थरबुद्धि हैं। अब उन्हें *पारसबुद्धि बनाने के लिए* 7 रोज़ की भट्ठी में बिठाओ।
(पतित को यहाँ तो बिठा नहीं सकते। यहाँ पावन ही रह सकते हैं। पतित को एलाउ नहीं कर सकते।)
13. शिव के मन्दिर में इतने ही हीरे जवाहर थे जो मुहम्मद गजनवी *ऊंट भरकर* ले गये। _(सही / गलत)_
° *गलत*… (इतने माल थे, ऊंट तो क्या कोई लाखों ऊंट ले आये तो भी भर न सकें। सतयुग में सोने, हीरे-जवाहरों के तो अनेक महल थे। मुहम्मद गजनवी तो अभी आया है। द्वापर में भी कितने महल आदि होते हैं। वह फिर अर्थक्वेक में अन्दर चले जाते हैं।)
14. *कल्प की आयु* लम्बी-चौड़ी क्यों कर दी है? कौन-से *तर्क* से यह सत्य स्पष्ट कर सकते?
° *84 लाख योनियाँ* समझने के कारण। (वास्तव में है 5 हज़ार वर्ष। बाप समझाते हैं तुम 84 जन्म लेते हो, न कि 84 लाख।)
° कल्प की आयु लाखों वर्ष दें फिर तो (ज़न) *संख्या* बहुत होनी चाहिए।
15. *हम सो* का अर्थ क्या समझते है? सही अर्थ क्या है?
° हम आत्मा सो परमात्मा कह देते हैं, कितना रांग है।
° सही अर्थ है *हम आत्मा ब्राह्मण सो देवता* सो क्षत्रिय…. बनती। (सो फिर ब्राह्मण)
